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पं. दीनदयाल उपाध्याय : एकात्म मानव वाद, अन्त्योदय एवं ग्राम विकास पर विश्वविद्यालय में दिनांक 15.09.201
Uploaded on: 2017-09-17

पं. दीनदयाल उपाध्याय : एकात्म मानव वाद, अन्त्योदय एवं ग्राम विकास पर विश्वविद्यालय में दिनांक 15.09.2017 को आयोजित संगोष्ठी

केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी तथा पं. दीन दयाल उपाध्याय जन्मशताब्दी समारोह समिति, काशी क्षेत्र, द्वारा संयुक्त रूप से प्रख्यात दार्शनिक व सामाजिक चिंतक पं. दीन दयाल उपाध्याय जी  के अकादमिक एवं सामाजिक योगदान तथा उनके बहुआयामीय व्यक्तित्व व कृतित्व पर चर्चा करने हेतु पं. दीन दयाल उपाध्याय जी की जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में दिनांक 15 सितंबर, 2017 को प्रातः 10:00 बजे से विश्वविद्यालयके अतिश सभागार में एक दिवसीय विद्वत संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र को सम्बोधित करते हुए उद्धाटन सत्र के अध्यक्ष केन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी के कुलपति प्रो. गेशे नवांग समतेन ने कहा कि पं. दीन दयाल उपाध्याय जी का जीवन व उनका दर्शन बहुआयामीय है, जिसमें, राजनीति, समाज, दर्शन, अर्थव्यवस्था सभी पर प्राचीन भारतीय संस्कृति व परम्पराओं पर आधारित उनके मौलिक विचार समाहित हैं। संकृति व विद्या पर आधारित जीवन ही व्यक्ति व समाज तथा राष्ट्र के लिए सार्थक व उपयोगी हो सकता है, तथा पं. दीन दयाल उपाध्याय जी का जीवन व कर्म इस तथ्य का युगानुकूल प्रमाण है।  

उद्धाटन सत्र के मुख्य अतिथि, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी के कुलपति प्रो. जी. सी. त्रिपाठी, ने पं. दीन दयाल उपाध्याय जी के जीवन दर्शन की विवेचना करते हुए कहा कि पण्डित जी ने आज की सभी चुनौतियों को रेखांकित करने का काम बहुत पहले कर दिया था। आज उनके जीवन व आदर्श से हमें प्रेरणा के साथ उन चुनौतियों से लड़ने की ताकत भी मिलती है। मुख्यअतिथि प्रो. जी. सी. त्रिपाठी ने अपना वक्तव्य देते हुए आगे कहा कि भारत का चिन्तन मौलिक है। यहाँ की परम्परा नैसर्गिक एवं प्राकृतिक है। भारत की मिट्टी से निकलने वाली सभी धर्मो की सोचशान्ति समभाव व एकता ही रही है। आज राष्ट्र के सामने जो भी आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक चुनौतियाँ हैं यदि हम भारतीय सांस्कृतिक व दार्शनिक विरासत के परिपेक्ष्य में उनका विश्लेषण करें तो निश्चय ही इन सभी समस्याओं के युगानुकूल समाधान के साधन प्राप्त कर सकते हैं।

उद्धाटन सत्र के विशिष्ट अतिथिभारतीय जनता पार्टी के संगठन मंत्री श्री रत्नाकर जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि यदि हमने अपने देश को महान बनाया है तो इसे बिगाड़ने का काम भी हमने ही किया है। जिसके कारण आज उसे फिर से भारतीय संस्कृति एवं परम्परानुसार बनाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही बनती है। भारतीय संस्कृति सकारात्मकता और स्वीकार्यता की संस्कृति रही है, हमें किसी को दुख नहीं देना है। हमारेसभी कर्म  सकारात्मक होने चाहिए यही पं दीनदयाल उपाध्याय के जीवन का केन्द्रीय संदेश था ।

उक्त अवसर पर विशिष्ट अतिथि भदोही संसदीय क्षेत्र के सांसद माननीय वीरेन्द्र सिंह मस्त ने कहा कि हमारा भोजन, बचन सभी प्राकृतिक अधार पर होता है। कृषि हमारे देश कीजीवन धारा है, जब कि अन्य देशों में व्यवसाय को प्रमुख माना जाता है। राष्ट्र की पहली इकाई परिवार हैं। वर्तमान स्थिति में परिवार टूट रहे है।परिवार टूटने का खतरा देश को कमजोर कर रहा है, जिस के समाधान हेतु हम सभी को विचार करना होगा। आय से बचत की परम्परा हमारी एक विलक्षण प्राचीन परम्परा रही है यहाँ कर्जदार को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता रहा है, हमें इस परम्परा का पालन करते हुए आने वाली पीढ़ियों में बचत करने की आदत को प्रोत्साहित कर उसका विकास करना चाहिए, बचत की परम्परा ही देश को स्वालम्बी बनाती है।

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के प्रचारक तथा विशिष्ट अतिथि श्री रामाशीष जी ने पण्डित दीन दयाल उपाध्याय जी के व्यक्तित्व पर चर्चा करते हुए कहा कि उनकी कथनी और करनी का साम्य तथा मानव मात्र के सर्वांगीण उत्थान हेतु किए गए उनके प्रयास ही उन्हें मानव से महा मानव बनाते हैं तथा हम सभी को प्रेरणा देते हैं।   

उद्धाटन सत्र के प्रारम्भ में मुख्य अतिथि, सभा-अध्यक्ष तथा विशिष्ट अतिथियों ने दीप पज्ज्वलित करतथा पण्डित दीनदयाल उपाध्याय जी के चित्र पर माल्यार्पण और विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं द्वारा संस्कृत व भोट भाषा में मंगलाचरण द्वारा कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। तत्पश्चातकेन्द्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय, सारनाथ, वाराणसी के कुलपति तथा संगोष्ठी के अध्यक्ष प्रो. गेशे नवांग समतेन जी ने खतक् तथा अंगवस्त्र प्रदान कर और विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. रणशील कुमार उपाध्याय ने स्वागत वक्तव्य द्वारा सम्मानित अतिथियों का स्वागत किया। संगोष्ठी का संचालन डॉ. राम सुधार सिंह जी ने किया। तथा धन्यवाद ज्ञापन पं. दीन दयाल उपाध्याय जन्मशताब्दी समारोह समिति के मार्गदर्शक श्री दीन दयाल पाण्डेय जी ने किया।

उक्त अवसर पर पं. दीन दयाल उपाध्याय जन्मशताब्दी समारोह समिति के समस्त सदस्यगण, विश्वविद्यालय के शैक्षणिक, शोध व अन्य विभागों के कर्मचारी गण छात्र-छात्राएं, आमंत्रित अतिथि व प्रेस व मीडिया कर्मी उपस्थित रहे।   

उद्घाटन सत्र के उपरान्त एकात्म मानव वाद, अन्त्योदय एवं ग्राम विकास पर आयोजित तकनीकि सत्रों में  श्री रामाशीष जी ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि युद्ध में हथियार बेंच कर अमीर हुए राष्ट्रों में भोगवादी पूंजी वाद का विकास हुआ तथा मनुष्य को यंत्रवत जड़ मान कर साम्यवादी अर्थव्यवस्था का विकास हुआ। इन कारणों से पण्डित दीनदयाल जी दोनों ही व्यवस्थाओं से अलग भारतीय संस्कृति, परम्परा तथा ज्ञान पर आधारित अर्थव्यवस्था के पक्षधर थे वे कहा करते थे कि हमारी शिक्षा, राजनैतिक व्यवस्था तथा अर्थ तंत्र हमारे अपने चिंतन और परम्परा से उद्भूत होने चाहिए न कि विदेशों से आयातित।

संगोष्ठी में प्रतिपक्ष रखते हुए के. ति. अ. वि. वि. के अम्बेडकर चेयर प्रोफेसर प्रदीप पी. गोखले ने कहा कि इन गम्भीर विषयों पर विचार करते समय हमें यह अवश्य स्पष्ट करना चाहिए कि भारतीय संस्कृति तथा प्राचीन भारतीय परम्पराओं के हमारे स्रोत क्या हैं यदि वह उपनिषदों में वर्णित उद्दात्त मानवीय मूल्यों पर आधारित हैं तो सर्वथा ग्राह्य है साथ ही हमें तत्कालीन व समसामयिक सामाजिक स्थितियों के आधार पर समीक्षक तथा साधक-बाधक भाव से ही किसी भी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए।

भारतीय अध्ययन केन्द्र के चेयर प्रोफेसर राकेश उपाध्याय ने कहा कि कि प्राचीन ग्रामीण भारतीय समाज उद्यमी था न कि केवल कृषक समाज। एक समय था जब गाँव एक स्वावलम्बी इकाई के रूप में स्थापित था गाँव के प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में हुनर था काम था तथा उसका स्थानीय बाजार था। इस व्यवस्था के ध्वस्त होने के कारण आज हर व्यक्ति रोजगार के लिए महानगरों की ओर भाग रहा है और नगरों की व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। ग्राम इकाई को पुनर्जीवित किए बिना कोई भी सरकार इस विकराल बेरोजगारी की समस्या को समाप्त नहीं कर सकती।

संगोष्ठी के संयोजक तथा के. ति. अ. वि. वि. के प्रो. देवराज सिंह जी ने पण्डित दीन दयाल उपाध्याय जी द्वारा प्रतिपादित अपिरमात्रिक उत्पादन, आवश्यक उपभोग तथा वांछित बचत पर प्रश्न करते हुए मुख्य वक्ता श्री रामाशीष से जानना चाहा कि वर्तमान परिस्थितियों में उपभोग और बचत की आदर्श सीमा क्या हो सकती है।     

के. ति. अ. वि. वि. के प्रो. वांग्चुक दोर्जे नेगी जी ने पण्डित जी के एकात्म मानव वाद पर चर्चा करते हुए कहा  कि जीवन की तात्विक समझ तथा तद्नुसार आचरण ही एकात्म मानव वाद का मूल संदेश है क्योंकि इस बात से हम सभी सहमत हैं कि भारतीय ज्ञान परम्परा के विचारों के समान उदार विचार अन्य किसी साहित्य में नहीं हैं किन्तु समाज में इन उदार मानवीय मूल्यों का अनुकरण कम ही दिखायी देता है।

संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में विषय प्रवर्तन करते हुए डी. ए. वी. पी. जी. कालेज के डॉ. दीना नाथ सिंह जी ने पण्डित जी के साथ हुई उनकी मुलाकातों के संस्मरण के माध्यम से उनके त्यागमय जीवन तथा उनके राजनैतिक दर्शन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पण्डित जी आजादी के बाद के भारत के स्वरूप पर भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के आलोक में विचार कर रहे थे और उनके द्वारा प्रतिपादित राजनैतिक सिद्धान्त सर्वकालिक हैं क्योंकि वह मनुष्य व मानवता को केन्द्र में रख कर सृजित हैं।

द्वितीय तथा तृतीय तकनीकि सत्र का अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुए के. ति. अ. वि. वि. के प्रो. एल. एन. शास्त्री जी ने कहा कि भारतीय परम्परा में मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता की जिस व्यापक ढंग से विवेचना की गई है वह अतुलनीय है तथा पं. दीन दयाल उपाध्याय जी भी उसी परम्परा के संवाहक हैं इनके विचारों पर चिंतन मनन और उनका आचरण निःसंदेह कल्याणकारी सिद्ध होगा।

संगोष्टी के तीनों सत्रों में डॉ. पेमा तेनजिन, डॉ. रामजी सिंह, डॉ. अनुराग त्रिपाठी, डॉ. विवेकानन्द तिवारी सहित कई अन्य कई विद्वानों ने अपने लेख पढ़े तथा प्रश्नोत्तर चर्चा में भाग लिया।

उपर्युक्त तकनीकि सत्रों में प्रो. बी. आर. त्रिपाठी, डॉ. बनारसी लाल, डॉ. वन्दना झा, डॉ. उमेश चन्द्र सिंह, डॉ. कौशलेश सिंह, डॉ. ए. के. राय सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे।

विश्वविद्यालय के प्रलेखन अधिकारी श्री राजेश कुमार मिश्र ने संगोष्ठी के रिपोर्टियर के दायित्व का निर्वहन किया तथा संगोष्टी के संयोजक प्रो. देवराज सिंह जी ने समापन वक्तव्य देकर धन्यवाद ज्ञापित किया। 

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