विभाग

मूल शास्त्र विभाग

इस विभाग का उद्देश्य है - नालंदा के बौद्ध विद्वानों द्वारा प्रतिपादित बौद्ध दर्शन को तथा न्याय, मनोविज्ञान, नागार्जुन, वसुबंधु, चंद्रकीर्ति, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति आदि बौद्ध सिद्धों के ग्रंथों को जीवित रखकर उनकी अभिवृद्धि करना ।

बौद्ध दर्शन की देशना है जीवन के वास्तविक अर्थ तथा उद्देश्य को अवगत करने में छात्रों की सहायता करना । अन्य साथियों की विश्व को जीने के लिए एक बेहतर जगह बनाने के लिए सहायता करना – केवल मनुष्य-प्राणियों के लिए ही नहीं, बल्कि सभी सजीव प्राणियों के लिए । इसमें बल केवल अपने जीवन की बेहतरी पर नहीं, बल्कि करुणा तथा शांति के सार को अपने स्वयं में तथा समूचे विश्व में प्रादुर्भूत करना ।

इस विभाग के शैक्षिक उद्देश्य तथा अध्यापन-शास्त्रीय कार्यक्रम उस अमूल्य दार्शनिक विरासत को बरक़रार रखने के कार्य को लेकर हैं, जो नागार्जुन, आर्यदेव, असंग, वसुबंधु, चंद्रकीर्ति, दिङ्नाग, धर्मकीर्ति जैसे आचार्यों तथा बौद्ध सिद्धों ने प्रदान की है । उनके ग्रंथों का अध्ययन पारम्परिक विद्वानों की तरह किया जाता है ।

ग्रंथों में निहित अध्यात्म के सार को मन में प्रतिष्ठित करने, मानव - जीवन के अर्थ तथा उद्देश्य को जानने, सभी सत्त्वों के लिए इस जगत् को एक बेहतर जगह बनाने के लिए, एक-दूसरे की सहायता करने के लिये छात्रों को तैयार किया जाता है । इसका केंद्रवर्ती संदेश है अपने स्वयं में करुणा तथा शान्ति का सम्वर्धन करना तथा विश्व में उनकी अभिवृद्धि करना।

प्राध्यापक वृंद

सम्प्रदाय शास्त्र विभाग

साक्य सम्प्रदाय विभाग

साक्य सम्प्रदाय विभाग की स्थापना 1967 में मार्ग और फल की नालंदा परंपरा से चलती आई मूल्यवान् परम्पराओं को जीवित रखकर उनका प्रसार करने के उद्देश्य से हुई ।

इतिहास

इस सम्प्रदाय के संस्थापक थे महान् आचार्य खोन् कोन्-चोग् ग्याल्-पो (1034ईसवी) । मार्ग तथा फल की देशनाओं को उन्होंने महान् अनुवादक ड्रोक्मी साक्य येशे (992-1074) से प्राप्त किया । जो परम्परा नालंदा विश्वविद्यालय के महंत आचार्य धर्मपाल से संक्रमित हुई थी । सैद्धांतिक दृष्टि से, इस परम्परा के स्रोत भारतीय योगी विरु-पा और फिर गयाधर है । ड्रोक्-मी ने भारत की यात्रा की, वहाँ पर उन्होंने कालचक्र, मार्ग और फल, आदि की देशना कई भारतीय आचार्यों से प्राप्त की । वे तिब्बत लौटे और इस परम्परा का अध्यापन शुरू किया । खोन् कोन्-चोक् ग्याल्-पो ने मध्य तिब्बत के छ़ाङ् प्रांत में शुभ्र स्थान की चोटी पर एक मठ स्थापित किया । इसी कारण उसे साक्य कहा गया और उस सम्प्रदाय को तिब्बत में साक्य सम्प्रदाय इस नाम से जाना जाने लगा।

इस सम्प्रदाय की विषय-वस्तु है-भारतीय आचार्य विरूप द्वारा वर्णित तांत्रिक सिद्धांत तथा साधना व्यवस्था की साधना करना । उन्होंने सभी बौद्ध तंत्रों के सार-भाव का साधारण रूप से तथा हेवज्र तंत्र का विशेष रूप से सूत्रपात किया । वह सूत्र तथा तंत्र दोनों देशनाओं के समग्र मार्ग तथा फल का समन्वय है । मार्ग तथा फल में अभिव्यक्त दार्शनिक दृष्टिकोण है संसार तथा निर्वाण में अपृथकता । इस दृष्टिकोण के अनुसार संसार तथा निर्वाण दोनों की जड़ है मन। जब वह मलिन हो जाता है तब संसार का रूप धारण कर लेता है और जब मलों से मुक्त हो जाता है तब वही निर्वाण बन जाता है । इसलिए वास्तव में व्यक्ति को चाहिए कि वह ध्यान के माध्यम से इन दोनों की अपृथकता का साक्षात्कार कर लें ।

इस सम्प्रदाय के पाँच महान आचार्य थे- साचेन् ञिङ्पो (1092-1158), सोन छ़ेमो (1142-1182), डाक्-पा ग्याल् छ़ेन् (1147-1216), साक्य पंडित (1182-1251), तथा चोग्याल फक्-पा (1235-1280) । मुख्य सम्प्रदाय के भीतर के उप-सम्प्रदाय हैं – ङोर तथा छार परम्पराएँ । ङोर्-चेन् कुंगा झाङ्-पो (1382-1457) तथा कोन्-चोक् ल्हुन्-ड्रुप, थार्त्छे नम्-खा पेल्-संग तथा ड्रुब्- खङ् पाल्-डेन् धोन्-डुप जैसे अनुक्रमिक आचार्यों को ङोर परम्परा धारक माना जाता है । छ़ार-चेन् लोसेला ग्याछो (1502-56) के नेतृत्व में चला परम्परा को छ़ार् परम्परा कहा जाता है । साक्य-पा की प्रमुख देशना तथा साधना को लाम्-द्रे-मार्ग तथा फल कहा जाता है ।

प्राध्यापक -वृंद

ञङ्मा सम्प्रदाय विभाग

ञिङ्मा सम्प्रदाय विभाग की स्थापना 1967 में उस समय के केंद्रीय उच्च शिक्षा तिब्बती संस्थान में हुई; यह संस्था उस समय संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की एक विशेष शाखा के रूप में कार्य कर रही थी । ञिङ्-मा-पा संप्रदाय महान् भारतीय आचार्य शांतरक्षित तथा पद्मसंभव द्वारा स्थापित किया हुआ तिब्बती बौद्ध धर्म का सबसे प्राचीन संप्रदाय था ।

इतिहास

राजा ठिसोङ् ड्यूछ़ेन ने 810 ईसवी में भारतीय आचार्य पद्मसंभव को तिब्बत बुलाया । उन्होंने कई वज्रयान ग्रंथों का अनुवाद किया और गुप्त मंत्र का धर्मचक्रप्रवर्तन सम्ये मठ में किया। उन्होंने गोपनीय ढंग से कई वज्रयान देशनाओं की अपने विशेष शिष्यों को शिक्षा दी – उनमें स्वयं राजा तथा अन्य 25 अनुयायी शामिल थे । क्रमशः यह संक्रमण गुप्त मंत्र संप्रदाय ञिङ्मा-पा नाम से विकसित हुआ । उन्होंने झॉग्-चेन देशना का सूत्रपात किया, जिस देशना में मन के स्वरूप को पहचाना गया है, खासकर विशुद्ध जागरूकता नामक उसके मूलभूत पहलू को । यह महान् परम्परा गुरु पद्मसंभव, विमलकीर्ति तथा महान् अनुवादक वैरोचन के माध्यम से विकसित हुई । आगे चलकर महान आचार्य लोन्-चेन् रब्-जम्-पा ने झोग्-चेन् देशना को एक समावेशक दार्शनिक तथा चिंतनात्मक व्यवस्था के रूप में व्यवस्था-बद्ध किया । इन देशनाओं का विकास सदियों होता रहा, और तिब्बत के 42वें राजा त्रिराल्-पा-चेन् का इस धर्म के प्रसार में बहुत बड़ा योगदान रहा। उन्होंने भिक्षु-संघों से किये जानेवाले व्यवहार को लेकर साधारणजनों के लिए कई आचार-सिद्धांत बनाए, जैसा कि एक परिवार को कितने भिक्षुओं की देखभाल करनी चाहिए आदि। उन्होंने देशनाओं के अनुवाद के बारे में नये नियम बनाए तथा कतिपय नये मठ स्थापित किये । ङग्युर या पुरातन अनुवाद शिक्षाएँ, आचार्य शांतरक्षित, गुरु पद्मसंभव तथा राजा ठिसोङ् ड्यूच़ेन् ने उनकी स्थापन करने के समय से, तीन अवस्थाओं से गुज़रीं ञाग्, नुब्, तथा झुर युग जिन्हें क्रमवर्ती-पीढ़ियों ने एक-एक अवस्था में धारण किया । कोश-शोधकों ने गुप्त देशनाओं का फिर से पता लगाया; ये देशनाएँ स्वयं गुरु ने सुरक्षित स्थानों पर भूमि गाड़ कर रखी थीं, ताकि उन्हें क्षति न पहुँचे और वे दूषित न हो जाएँ । 17वीं तथा 18वीं शतियों के दौरान प्राचीन ञिमा-पा सम्प्रदाय धीरे-धीरे छः अलग-अलग मठों में बँट गया । हर मठ की सैकडों शाखाएँ थीं। मिन् ड्रॉलिङ् तथा दोजें-द्र-ग् जैसे मठ मध्य तिब्बत में स्थापित हुए । शेचेन् तथा झोग्-चेन् खाम या पूर्व प्रांत के मध्य में स्थापित हुए और कथोग् तथा पत्युल डुपरी खाम के दक्षिण-पूर्व भाग में स्थापित हुए । वर्तमान में इन मठों की पुनः स्थापना दक्षिण भारत में मैसूर तथा उत्तर भारत में देहरादून, शिमला आदि स्थानों पर हुई । इस परम्परा को लोङ्चेन् रब्-जम्-पा, रङ्झोम्, जिग्-मेद्-लिङ्-पा, जु मिफाम् आदि ने बनाया । नौ यानों में समाविष्ट समग्र बुद्ध-देशना के दार्शनिक तथा तांत्रिक दोनों प्रकार के अध्ययन का उत्तरदायित्व इस सम्प्रदाय ने स्वंय लिया । तीन भीतरी तंत्रों की ध्यान-साधना पर इसका जोर है । झोग्-चेन्, महा-पारमिता इस देशना का तथा साधना-मार्ग का केंद्रवर्ती विषय बना ।

प्राध्यापक -वृंद

गेलुग सम्प्रदाय विभाग

महान् भारतीय आचार्य अतिश से चली आई मूल्यवान् कदंप परंपरा को जीवित रखकर उसका प्रसार करने हेतु 1967 में गेलुग सम्प्रदाय विभाग की स्थापना हुई ।

इतिहास

गेलुग सम्प्रदाय की स्थापना आचार्य जे. च़ोंखापा लोब्संग डाक्-पा (1339-1419) ने की । वे एम्डो प्रांत के च़ोंखा इलाक़े में पैदा हुए थे । तीन वर्ष की आयु में उन्हें चौथे कर्मा-पा ने दीक्षित किया और सात वर्ष की आयु में उन्हें श्रामणेर शपथ दी गयी । च़ोंखा-पा ने लंबी यात्रा की और उस समय मौजूद सभी तिब्बती संप्रदायों के तथा मुख्यतः कदंप आचार्यों के साथ अध्ययन किया । भारत की विक्रमशिला के महान् आचार्य अतिश (982-1054) को 1039 में तिब्बत बुलाया गया और उन्होंने सूत्र तथा तंत्र दोनों की देशना को सिखाया । उनकी देशना-परंपरा को आगे खुतोन, ङोक् लोडेन् शेरब (1059-1109) तथा ड्रोमटोन्पा ग्यालवई जुंग्ने (1005-1064) के ज़रिये संक्रमित किया गया इसी को कदंप परम्परा कहा जाता है ।

जे चोंखा-पा के कई शिष्य थे, जैसे कि ग्याल्त्सब धर्म रिन्-चेन् (1364-1432), खेद्रुब गेलेग पेल्संग (1385-1438), ग्याल्स्वा गेन्डुम् ड्रुप (1391-1474), जम्-यंग् चोजे टशी पाल्डेन (1379-1449), जमचेन् चोजे शाक्य येशे, जे शेरब सिंगे तथा कुंगा धोंडुप (1354-1435) ये सबसे अधिक प्रसिद्ध शिष्य रहे है ।

चोंखा-पा ने 1409 में गादेन मठ की स्थापना की । फिर गेलुग-पा सम्प्रदाय स्थापित हुआ । इस सम्प्रदाय का मूल नाम गादेन-पा था । मठ को दो महाविद्यालयों में विभक्त किया गया शार्ल्सो तथा जङ्त्से । इस सम्प्रदाय के अन्य मठ हैं – ड्रेपुङ्, सेरा, टशी ल्हुम्पो, ग्युतोद तथा ग्युमेर । उनके एक शिष्य जम् यंग् चोजे टशी पाल्डेन ने ड्रेपुंग मठ की स्थापना 1416 में की । इस मठ की दो शाखाएँ हैं – लोसेलिङ् और गोमङ् । चोंखा-पा के दूसरे एक शिष्य जमचेन् चोजे साक्य येशे ने सेरा मठ की स्थापना 1419 में की इसके दो भाग हैं - सेरा जे तथा सेरा मे ।

ग्यालावा गेन्-डुम् ड्रुप, प्रथम दलाई लामा ने टशी लुम्-पो मठ की स्थापना शिंगत्से में 1447 में की – यह पंछेन लामाओं का पीठ बन गया । इस मठ के भिक्षु आमतौर पर सूत्र-देशनाओं का अध्ययन करते थे, जबकि मंत्र देशनाओं की साधना मुख्यतः अन्य दो मठों में हुआ करती थी । यानी कि जे शेरब सेन् गे में स्थापित ग्युमे मठ - निम्न तांत्रिक मठ 1440 में ग्युचेन कुंगा ने 1474 में स्थापित ग्युतोद, उच्च तांत्रिक मठ ।

गेलुग सम्प्रदाय के प्रमुख सिद्धांतों में निम्नलिखित बातें समाविष्ट हैं- बोधि-मार्ग की अवस्थाएँ (लाम्-रिम्) जो महान् भारतीय आचार्य अतिश (11वीं शती) की देशना पर आधारित हैं, सूत्र तथा तंत्र की साधनाओं का मेल इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र है, जिससे कि परमानंद तथा शून्यता की अनुभूति हो ।

इस संप्रदाय के भिक्षु पाँच प्रमुख शास्त्रों का अध्ययन करते हैः अभिधर्मकोश, प्रातिमोक्षसूत्र, प्रमाणवार्तिक, अभिसमयालंकारप्रज्ञापारमिता, तथा मध्यमकावतार ।

प्राध्यापक -वृंद

कर्ग्युद सम्प्रदाय विभाग

कर्ग्युद सम्प्रदाय की स्थापना 1967 में, नारोपा तथा मैत्री-पा इन दो महान् भारतीय सिद्धों की मूल्यवान् परंपरा को जीवित रखने तथा उसका प्रसार करने के उद्देश्य से हुई ।

इतिहास

तिब्बती बौद्ध धर्म के कर्ग्यु पा सम्प्रदाय की शुरुआत दो अलग-अलग स्रोतों से हुई । मार-पा लोत्सावा (1012-1095) तथा ख्युङ्पो न्यालजोर (978-1079) । मार्-पा लोत्सावा पूर्ववर्ती परम्परा के संस्थापक थे । उन्होंने ड्रोमी येशी के मार्गदर्शन में अध्ययन किया तथा अनुवाद का प्रशिक्षण लिया । बाद में तीन बार उन्होंने भारत की यात्रा की और चार बार नेपाल की सच्ची देशनाओं की खोज करने के लिए । कई भारतीय आचार्यों के मार्गदर्शन में उन्होंने अध्ययन किया, लेकिन मुख्यतः महान् सिद्ध आचार्य नारो-पा तथा मैत्री-पा के मार्गदर्शन में । मार्-पा ने आभास-रूप शरीर, चेतना-संक्रमण, स्वप्न, स्वच्छ प्रकाश तथा भीतरी उष्णता की तांत्रिक देशनाओं की परंपरा सीधे नारोपा (1016-1100) से ग्रहण की थी । स्वयं नारोपा ने भी इन देशनाओं को अपने गुरु तिलो पा (988-1069) से सीधे ग्रहण किया था । तिलो-पा ने इसको बुद्ध वज्रधर से सीधे ग्रहण किया था । इन महान् देशनाओं को मार-पा तिब्बत ले आये और बाद में अपने सर्वश्रेष्ठ शिष्य मिलारे-पा (1040-1123) को संक्रमित की । मिलारे-पा वह एकमेव योगी महात्मा थे जिन्होंने अपने जीवन-काल में ही गोपनीय मंत्रयान पद्धति की साधना कर बोधि प्राप्त की ।

मार्-पा की ध्यान-परम्परा को आगे चलानेवाले एक महात्मा थे मिलारे-पा और ङाग चोकु दोर्जे, छुंरतन वान्गे, मेटोन चेन्पो आदि अन्य लोगों ने मार्-पा की देशना-परम्पराओं को आगे बढ़ाया । इस तरह दार्शनिक ध्यान प्रशिक्षणों की दोहरी व्यवस्था की स्थापना कर्ग्युद सम्प्रदाय में स्थापित हुई । महान् गुरु ग्याम्-पो-पा (1084-1161) तथा रेचुङ्-पा (1084-1161) ये दोनों मिलारे-पा के प्रसिद्ध शिष्य थे । ग्याम्-पो-पा ने मिलारे-पा से नारो-पा के छः योगों की महा-मुद्रा देशनाओं को ग्रहण किया और उन्हें एक ही परम्परा में सन्निहित कर दिया । यह परम्परा डाक्-पो कग्युद, कग्युद परम्परा की मातृ-परम्परा नाम से प्रसिद्ध हुई । कग्युद परम्परा के दो मूल रूपों में से एक शङ्-पा कग्युद की स्थापना ख्युङ्-पो न्याल जोर (978-1079) ने की । वे नेपाल गये, जहाँ पर उनकी भेंट आचार्य सुमति से हुई । उनसे उन्होंने ग्रंथों के अनुवाद का प्रशिक्षण लिया और बाद में भारत की यात्रा की । सौ से भी अधिक भारतीय पंडितों से मिलने तथा उनसे विभिन्न दार्शनिक और गुप्त मंत्र-देशनाओं को ग्रहण करने के बाद उन्होंने समग्र सुगम तथा दुर्गम सिद्धांतों पर प्रभुत्व प्राप्त किया । सुखसिद्ध, राहुलगुप्त तथा निगुमा, नारो-पा की संगिनी, को उनके मुख्य आचार्य समझा जाता है । आगे चलकर यह परम्परा शाङ्-पा कग्युद परम्परा नाम से प्रसिद्ध हुई । डाग्-पो कग्युद पंरपरा की अपनी 12 शाखाएँ है । उसके चार मुख्य सम्प्रदाय और 8 उप-सम्प्रदाय है । इस मत का मूलभूत सिद्धांत है महामुद्रा तथा नारो-पा की छः प्रमुख देशनाओं की साधना । इन चार सम्प्रदायों में से कमछ़ङ् कग्युद को प्रथम कर्मा-पा दुसुम ख्येन् पा ने स्थापित किया । बारोम् दर्मा वाङ् चुक ने दूसरे बारोम कग्युद की स्थापना की । झाङ् छ़ाल्-पा छ़ोन् द्रु ड्राक्-पा ने तीसरे की स्थापना की और छ़ाल्-पा कग्युद तथा फाग्-मो द्रुपा ने चौथे फग्द्रु कग्युद की स्थापना की ।

आठ लघु कग्युद सम्प्रदाय हैं – ड्रिकुङ् कग्युद, जिसकी स्थापना द्रिगुङ् क्योन्-पा जिग्तेन् सुमगोन ने की, टक् लुंग कग्युद की स्थापना तग् लुंग थङ्-पा टशी पास्ला ने की; थ्रोफु कग्युद को ग्यास त्शा और कुंदेन् रेपा ने स्थापित किया; ड्रुक्-पा कग्युद की स्थापना लिंगरे पेमा दोर्जे तथा छाङ्-पा ग्यारे येशे दोर्जे ने की; मार्-छ़ंङ् कग्युद की स्थापना मार्-पा ड्रुब्थोब् शेरब सेंगे ने की, येल्-पा कग्युद को ड्रुब्-थोब येशे छ़ेग्-पा ने स्थापित किया, यझङ् कग्युद शरवा काल्डेन येशे सेंगे ने स्थापित किया, तथा शुग्-सेब् कग्यु की स्थापना ग्येरगोम् चेन्-पो ने की । इन विभिन्न उप-सम्प्रदायों की निर्मिति मूलभूत देशनाओं की ओर देखने के व्यक्तिगत दृष्टिकोणों में होनेवाले भेद के आधार पर हुई है । महामुद्रा नामक कग्युद परम्परा के अनन्य साधारण पहलू को सूत्र तथा तंत्र दोनों के अर्थनिर्णय के अनुसार स्पष्ट किया जा सकता है । देशनाओं के इन दोनों पहलूओं का उद्देश्य है - मन के वास्तविक स्वरूप को, स्वच्छ प्रकाश का, साक्षात् बोध ।

प्राध्यापक -वृंद

बोन सम्प्रदाय शास्त्र विभाग

इतिहास

तोन् पा शेन्-रब मिवोचे और बोन का इतिहास : तिब्बत के मूल-निवासियों की पूर्व-बौद्ध अति-प्राचीन धार्मिक परंपरा है बोन । आज भी तिब्बत में तथा भारत में कई तिब्बती लोग इस धर्म का आचरण करते है । इस मानवीय जगत् में बोन् धर्म के संस्थापक हैं तोन्-पा शेन्-रब मिवोचे ।

पारंपरिक जीवन-वृत्तांत के अनुसार, पूर्वयुग में शेन्-रब को साल्वा कहा जाता था और उन्होंने बोन सिद्धांतों का अध्ययन अपने दो भाई डाग्-पा और शे-पा के साथ सिद-पा येसङ् स्वर्ग-लोक में बोन महात्मा बुम्त्री लोगी चेसन के मार्गदर्शन में किया । अपना अध्ययन समाप्त करने के बाद तीनों भाइयों ने करुणा के देवता, शेनल्हा ओकर से भेंट की, यह पूछने के लिए कि वे लोग सजीव प्राणियों के दुःख कैसे हल्का कर सकेंगे । शेनल्हा ओकर ने उन्हें सलाह दी कि उत्तरोत्तर तीन कल्पों में मानवजाति के मार्ग-दर्शक बनें । डाग्-पा ने गत् कल्प में देशना दी; साल्वा ने तोन्-पा शेन्-रब मिवोचे का रूप धारण किया और वे वर्तमान युग के शास्ता तथा मार्गदर्शक बन गये । सबसे छोटे भाई शेपा अगले कल्प में देशना देने के लिए अविर्भूत होंगे ।

तोन्-पा शेन्-रब स्वर्ग-लोक से उतरकर मेरु पर्वत के तल-भाग के पास आविर्भूत हुए, अपने दो सबसे निकटवर्ती शिष्यों-मालो तथा युलो के साथ । तत्पश्चात् उन्होंने राजा ग्यास टोकर और रानी जंगा रिंगम के पुत्र के रूप में एक राजकुमार का जन्म लिया; इनका जन्म युंग्ड्रुंग गुत्सेग के दक्षिण में स्थित फूलों से भरे एक प्रकाशमान उद्यान में पहले काष्ठ पुरुष मूषक वर्ष (1857 B.C.) के पहले महीने के आठवें दिन सूर्योदय के समय हुआ । कच्ची आयु में ही उनका विवाह हो गया और उनके बच्चे भी हुए । 31 वर्ष की आयु में उन्होंने ऐहिक जीवन का परित्याग कर तपस्या करना तथा बोन सिद्धांत की देशना देना शुरू किया । बोन धर्म का प्रचार करने के उनके प्रयासों में जीवन भर ख्याब्-पा लग्रिङ् ने बाधाएँ डाली तथा शेन्-रब् के कार्य को नष्ट करने के लिए वह लड़ता रहा; अंत में उसका हृदय- परिवर्तन हो गया, और वह शेन्-रब का शिष्य बन गया । एक बार ख्याब्-पा ने शेन्-रब के घोड़े चुराए और शेन्-रब् ने झ्यांग झुंग के रास्ते दक्षिणी तिब्बत तक उसका पीछा किया । कॉङ्-पो पर्वत को लाँघकर शेनरब ने तिब्बत में प्रवेश किया ।

यह शेन्-रब् की तिब्बत को एकमेव भेंट थी । उस समय तिब्बती लोग यज्ञ किया करते थे । स्थानिक राक्षसों को शेन्-रब् ने शांत किया और आहुति देकर यजन करने के विषय पर निर्देश दिये ।

तोन्पा शेन्-रब् के देहांत के 1800 वर्ष बाद उनके वाचिक प्रकटीकरण के रूप में मुचो डेम्-डुग स्वर्ग-लोक से ओल्मो लुङ् रिङ् में अवतरित हुए । मुचो डेम्-डुग ने बोन धर्मचक प्रवर्तन किया, ताकि तोन्पा शेन्-रब की सभी देशनाओं का संगठन तथा वर्गीकरण हो सके । उन्होंने कई छात्रों को पढ़ाया । उनमें से सबसे अधिक जाने-माने छात्रों को छः महान् विद्वान या छः विश्व-भूषण कहा जाता है । उन्होंने बोन देशनाओं का अपनी-अपनी भाषाओं में अनुवाद किया तथा उन्हें अपनी-अपनी जन्म-भूमियों में प्रसारित किया । ये छः आचार्य थे । मुछ़ा ताहे, ठितोक पारछ़ा, तगझिग के हुलि परयाग, भारत के ल्हाडाग् ङाग्-डो, चीन के लेग्-तङ् माङ्-पोठ, तथा ट्रॉम के सेरटोक छेज़म् । आगे चलकर 11वीं शती में तेन्त्रोन चेपो नामक महान् कोष-हर्त्ता (शेन् चेन् लुगा, 969-1035 ईसवी नाम से भी जाने गए) तथा अन्य लोगों ने बोन के इन गुप्त ख़ज़ानों को पुनः हस्तगत किया । शेन्-चेन् लुगा तथा अनेक (ड्रु जे युड्ड्रुङ, झु ये लेग्पो तथा पेटन पालच्रोक् झाङ्-पो इन तीनों को छोड़कर) शिष्यों को उनके वारिस समझा जाता है । पहले हैं ड्रु जे युङ्-ड्रुङ् लाम, जिन्होंने येरु वेन्सा खा मठ की छ़ांग प्रान्त में 1012 ईसवी में स्थापना की । थेरु वेन्सा खा बोन शिक्षा का केंद्र बना । दुर्भाग्य से येरु वेन्साखा मठ बाढ़ तथा भूस्खलन के कारण उद्धवस्त हो गया । सारे जीवमात्रों के कल्याण हेतु बोन परंपराएँ जीवित रखने के लिए त्रामेद, शेरब् ग्याल्छेन् (1356-1415) सन् 1405 में टशी मेन्री लिङ् नामक एक नये मठ की छ़ांग प्रांत के टोब् ग्याल् गाँव में स्थापना की गयी । उस समय से मेन्री मठ सभी बोन्-पो लोगों का मातृ-मठ बन गया है ।

जब 1959 में चीन ने तिब्बत को जोड़ लिया, तब कई बोन्-पो भिक्षु तथा गृहस्थ निर्वासित होकर भारत तथा नेपाल आ गए । 1967 में महामहिम योङ् झिन् तेन्झिन नम्-डक् रिन्पोचे ने हिमाचल प्रदेश में नव टोप् ग्याल बोन्-पो बस्ती, दोलंजी की स्थापना की और परम पावन 33वें मेन्री ट्रिझिन् रिन्पोचे ने दोलंजी में बोन्-पो मठ बनाया । 1978 में बोन खंडन-मंडन संप्रदाय (जो येरुबेन्सा खा लाथा मेन्री का परिपूर्ण पारंपरिक प्रशिक्षण प्रदान करता है ) की मेन्री मठ में स्थापना की । परमपावन 33वें मेन्री ट्रिझ़िन् युवा भिक्षुओं की ज़रूरतों का ख़याल रखते हैं और मेन्री के इस खंडन-मंडन विद्यालय से ‘गेशे’ उपाधि लेकर भिक्षु स्नातक हो जाते है ।

केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय में बोन्-पो विभाग 1990 में परम पावन दलाई लामा के मार्गदर्शन तथा निरीक्षण में स्थापित हुआ, ताकि तिब्बत के स्थानिक धर्म को जीवित रखा जा सके । शुरू में इस विभाग का आरंभ गेशे गोरिंग तेन्झ़िन नाम के एक ही अध्यापक तथा चार छात्रो-द्रुग्से तेन्झ़िन, कलसङ् नोरबू, छ़ेवङ् ग्याल्यो और छ़ेवङ् से किया । सद्यः स्थिति में यहाँ पर लगभग 35 छात्र तथा पाँच अध्यापक बोन्-पो विभाग में हैं तथा कई छात्र यहाँ से स्नातक होकर समाज के अलग-अलग सत्रों में समाज-कल्याण-कार्य में लगे हुए है ।

अनुसंधान प्रकल्प

विद्वत् सहायता – वह पीएच्. डी. छात्रों को किस तरह सहायता प्रदान कर सकती है ।

  1. आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण ‘कें.ति.अ.वि.वि.’ के छात्र तथा प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण अन्य उम्मीदवारों को एम्. फिल्. शिक्षण-क्रम प्रदान किया जाता है, यह शिक्षण-क्रम 6 माह का होता है । एम्. फिल्. उत्तीर्ण छात्रों को 3 वर्ष के पीएच्. डी. शिक्षण-क्रम के लिए सीधा प्रवेश दिया जाता है । वर्तमान समय में इस संप्रदाय से एक छात्र पीएच्. डी. कर रहा है ।

  2. बाहर के छात्र (विदेशी) कें.ति.अ.वि.वि. विदेशों से छात्रों को अनियत अनुसंधाता के रूप में ग्रहण करता है, अलग-अलग आदान-प्रदान कार्यक्रमों के अंतर्गत इंडियन काउन्सिल ऑफ कल्चरल रिलिजन्स तथा युनिवर्सिटी ग्रांट्स् कमिशन के ज़रिये विदेशी छात्रों को ग्रहण करता है ।

उद्देश्य

सुव्यवस्थित तथा आधुनिक तरीके से विभाग के छात्रों को बोन धर्म की परंपरा का ज्ञान प्रदान करना ताकि युंग्ड्रुंग सबसे प्राचीन तिब्बती बोन धर्म तथा परंपरा को जीवित रखकर उसका प्रसार किया जा सके । इस बोन संप्रदाय विभाग के उद्देश्यों का केंद्र है ।

प्राध्यापक-वृंद

संस्कृत विभाग

तिब्बती भाषा तथा साहित्य विभाग

अभिजात एवम आधुनिक भाषा विभाग

सामाजिक विज्ञानं विभाग

Departmentतिब्बती पारम्परिक काष्ठ-कला विभाग

तिब्बती शिल्प-विद्या विभाग

बौद्ध धर्म में जिनकी जड़ें जमी हुई हैं उन तिब्बती शिल्प-विद्याओं तथा तिब्बती शिल्प-विद्याओं की सांस्कृतिक विरासत को बनाये रखने तथा वृद्धिंगत करने के लिए इस विभाग की स्थापना 2008 में की गई।

इतिहास

औजार बनाना, इमारतें बनाना तथा अन्य जरूरी उपकरण बनाना, इन सबसे जुड़ी हुई तिब्बती कलाओं का मूल तिब्बती राजा न्यात्री छ़ेन्-पो (27ईसा-पूर्व) के शासन-काल तक जा पहुँचता है ।

ऐसा कहा जाता है कि बौद्ध धर्म पर आधारित विधिवत् कलाएँ 28वें राजा ल्हाथो-हो-री-येन्-छ़ेन् के कार्यकाल में दृष्टिगोचर हुईं । आगे 7वीं शताब्दी में नेपाल तथा चीन के राजघरानों के साथ विवाह-संबंध जुड़ने के परिणाम-स्वरूप तिब्बती कलाओं का विकास हुआ । तिब्बती राजा सोंङ्-छ़ेन ग्याम्-पो के नेपाल तथा चीन की राजकुमारियों की साथ हुए विवाह की तिब्बत में बौद्ध धर्म तथा उस पर आधारित कलाओं के प्रसार में अहम भूमिका रही है ।

सम्राट ठिसोङ् देछ़ेन ने कई भारतीय बौद्ध विद्वानों को तिब्बत आमंत्रित किया तथा उनकी सहायता से तिब्बत के सर्वप्रथम बौद्ध मठ का निर्माण किया । इसमें भारत, तिब्बत और चीन की स्थापत्य शैलियों का समन्वय किया गया था । इसके साथ मूर्ति-कला तथा बुद्ध, देव-देवियाँ और भारत तथा तिब्बत के बौद्ध आचार्यों के वस्त्र-पट चित्रांकन और भित्ति-चित्रांकन की कलाओं का भी विकास हुआ ।

इन विभिन्न ललित कला शैलियों के आधार पर तिब्बतियों ने अपनी स्वयं की शैली-परम्पराएँ विकसित कीं । आगे चलकर उनको (मेन्-लु), (खेन् लुग्) तथा (कर्मा गार्दिस) जाना जाने लगा ।

प्राध्यापक वृंद

सोवा रिग्-पा विभाग

सोवा रिग्-पा, तिब्बती वैद्यक-शास्त्र विभाग की स्थापना कें. ति. अ. वि. वि. में 1993 में निम्नलिखित उद्देश्यों की परिपूर्ति के लिए की गयी ।

  1. तिब्बती चिकित्सा विद्या की अभिवृद्धि करना तथा समाज के बेहतर स्वास्थ्य की देखभाल में योगदान करना ।
  2. निर्वासित तिब्बती समुदाय, हिमालयीय लोग, तथा तिब्बती चिकित्सा विद्या में रुचि रखने वाले विदेशी विद्वान् इन सबके लिए तिब्बती वैद्यक-शास्त्र के अध्ययन का अवसर प्राप्त उपलब्ध कराना।
  3. इस अद्वितीय वैद्यक-व्यवस्था को विकसित करने के लिए इस प्राचीन तिब्बती चिकित्सा विद्या के क्षेत्र में और अधिक अनुसंधान को कार्यरत करना । सोवा रिग्-पा या चिकित्सा विद्या का तिब्बत में लंबा इतिहास रहा है । यह तिब्बत की स्थानीय वैद्यक व्यवस्था है । सोवा रिग्-पा पर धर्म, संस्कृति, जीवन-पद्धति तथा वातावरण का भारी प्रभाव रहा है । वह मुख्यतः बोन धर्म तथा बौद्ध धर्म पर आधारित है।

सदियों पुरानी यह पारंपरिक वैद्यक व्यवस्था व्याधियों के निदान के लिए मूत्र, नाड़ी, जिक्, तथा चक्षु आदि की परीक्षा का संमिश्र दृष्टिकोण अपनाती हैं । नाड़ी परीक्षा के आधार पर तीन आधारभूत ऊर्जाओं के संतुलन की तथा विभिन्न अवयवों की स्थिति की जाँच करना संभव होता है । इस परंपरा में दवाइयों की निर्मिति प्राकृतिक घटकों से, जैसे कि खनिज पदार्थों तथा वनस्पतियों से की जाती है । बीमारियों के इलाज के लिए मालिश, सूचिवेध तथा जैसी शारीरिक चिकित्सा-पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है ।

सोवा-रिग्-पा वैद्यक व्यवस्था भारतीय, फारसी, यूनानी तथा स्थानीय तिब्बती और चीनी वैद्यक व्यवस्थाओं का समन्वय है । उसका बड़ी मात्रा में व्यवसाय तिब्बत में, भारत में, नेपाल में, भूटान में, लद्दाख में, भारतीय हिमालयीन प्रदेशों में, चीन में, मंगोलिया में और साथ ही साथ, हाल ही में यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में भी किया जा रहा है ।

तिब्बत में बौद्ध धर्म के प्रवेश से पहले, बोन धर्म के संस्थापक शेन्-रब् मिवो चे ने भुम-शी नामक प्रमुख वैद्यक ग्रंथ पढाया - जो भारत के कुछ प्रदेशों में, तिब्बत तथा नेपाल में भी पढ़ाया पढ़ा जाता है । विज्ञान के 12 क्षेत्रों में फेन्-शेष् मेन्-चेद् को चिकित्साशास्त्र का मूलभूत ग्रंथ माना गया था ।

तिब्बत में बौद्ध धर्म के आगमन के बाद इस वैद्यक-व्यवस्था ने पारम्परिक बौद्ध श्रद्धाओं को धारण कर लिया – जैसे कि सारी बीमारियाँ मन के तीन विषों” के परिणाम हैः अज्ञान, राग और द्वेष । कोई भी व्याधि वात, पित्त, कफ इन तीन ऊर्जाओं के असंतुलन का परिणाम होती है । वात ऊर्जा विद्यमान होती है – तंत्रिका-व्यवस्था में, ऐंद्रिय व्यापारों में, खसन, पाचन, रक्ताभिसरण आदि में । वात ऊर्जा मानसिक संतोष तथा तनाव का भी नियमन करती है । पित्त ऊर्जा शरीर की उष्णता, यकृत का कार्य तथा रक्ताभिसरण को नियंत्रित करती है । कफ ऊर्जा शरीर की शीत ऊर्जा का नियमन करती है । वह शरीर के द्रवों, उत्तेजक रसों तथा लसिका व्यवस्था का नियमन करती है । ये तीनों ऊर्जाएँ भावनाओं तथा मूलभूत अभिवृत्तियों का परिणाम हैं और ये भावनाएँ तथा अभिवृत्तियाँ मूल अज्ञान द्वारा संस्कारित हुआ करती है । जब ये मूलभूत ऊर्जाएँ भावनाओं द्वारा, ऋतुपरिवर्तन द्वारा, आहार–विहार द्वारा असंतुलित हो जाती हैं, तब वे कई सारी अलग–अलग बीमारियों को उत्पन्न करती है ।

इतिहास

बोन वैद्यक परम्परा के पश्चात्, भारत के दो वैद्य विजय-गजे तथा बिमल-गजे की चौथी शती में तिब्बत भेंट के परिणाम-स्वरूप तिब्बत के 28वें राजा ल्हातो थोरी ञेन्छेन् (374-492) के शासन काल में एक नई वैद्यक परम्परा का सूत्रपात हुआ । राजा ने उन दोनों को अपने दरबार में आमंत्रित किया । विजय-गजे का ल्हाचम् येद्क्यी रोल्-चा के साथ विवाह हुआ था । उनको एक पुत्र हुआ । उसका नाम था । दुङ्-गी थोर्-चोग-चेन् । आगे चलकर वह सर्वप्रथम तिब्बती चिकित्सक बना । तथापि उसका चिकित्सा-कार्य केवल राजा के दरबार तक ही सीमित था । इस शासन काल में महान् सोङ्छ़ेन् ग्याम्-पो (617-650) तथा ठासोङ् द्-यू-छेन् (742 ईसवी) ने धर्मराज, हशङ् महा क्यिंता शांतिगर्भ, गुहेवज्र, ताङ्-सुम् - गङ्-वा, हशङ् बल्, हङ्ति-पत, हल-शांति, सेङ्-दो वोंद्-चेन् खोल मा-रु-छे, धर्मशील आदि कई विदेशी चिकित्सकों को भारत, चीन, पर्शिया, द्रुगु, दोल्-पो तथा नेपाल से आमंत्रित किया । अंत में, तिब्बती वैद्यक पर प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठी का सम्ये मठ में 728 में आयोजन हुआ । इस गोष्ठी में युथोक् योन्तेन गोन्-पा-1, द्रङ्-ती ग्याल्-न्ये- खरफुक् तथा कई और सुप्रसिद्ध तिब्बती चिकित्सकों ने हिस्सा लिया ।

महान् रिन्चेन् सङ्-पो (958-1056) ने वाग्भट के ‘अष्टांग-हृदयम्’ का तिब्बती में अनुवाद किया ।

योथोग् योन्तेन् गोन्-पो-1 कोन्-पो गये और वहाँ पर ता-ना- दुग् वैद्यकीय महाविद्यालय नामक प्रथम वैद्यक संस्था की स्थापना की । इसे तिब्बत का सर्वप्रथम वैद्यकीय विद्यालय माना जाता है । मेन्-पा-दुस्-रा-वा, का-चु-पा, रब्-नाम्स्-पा तथा भुम्-रा-पा जैसी विभिन्न उपाधियाँ प्रदान करने की परंपरा भी इस काल-खंड में स्थापित की गई । कई विद्वानों की मान्यता और श्रद्धा है कि वे ही ग्युद्-शी के बुनियादी शिल्पकार थे । युथोग् योन्तेन गोन्-पो-2 (1126-1202) ने युथोक्-1 (8वीं शती) के ग्रंथ के पांडु-लेख पर आधारित ‘ग्युद-शी’ की रचना की । यह अंत में समान तिब्बती चिकित्सकों के लिए प्रमुख ग्रंथ बन गया, अपवाद था भारत, तिब्बत तथा नेपाल के कतिपय भुम-शी व्यवसायिकों का । अंततः 14वीं शताब्दी में कुछ नई परम्पराएँ उभरी । 17वीं शती में पंचम दलाई लामा के शासन-कल में सोरिग्-द्रोफेन्-लिंग्, द्राङ्सोङ्-दुस्पइ-लिङ्, ल्हवङ्-चोक् सम्प्रदाय तथा सङ्-फु-ञिमा-थङ् सम्प्रदाय की स्थापना उनके सिंहासनस्थ होने के बाद की गयी । राज-प्रतिनिधि संग्ये ग्याछ़ो (1653-1705) ने पंचम दलाई लामा की इच्छानुसार वैद्यक-व्यवसाय तथा सिद्धान्तों के मानकीकरण की चेष्टा की तथा पोताला पैलेस के पास लोह पर्वत पर चोगपोरी वैद्यकीय महाविद्यालय की स्थापना की । उन्होंने कई वैद्यकीय ग्रंथों की रचना की इनमें सम्मलित हैं – ग्युद-शी पर लिखी प्रसिद्ध टीका – ‘वैदुर-ञोन्-पो’ तथा 79 वैद्यकीय चित्रों को तैयार करवाया । 13वें दलाई लामा के कार्य-काल में (1895-1933) मेन्-छ़ी-खङ् नाम के एक नये वैद्यकीय तथा ज्योतिष महाविद्यालय की स्थापना की गयी – ल्हासा में 1916 में । आज यह संस्था तिब्बत तथा चीन की वैद्यकीय संस्थाओं में अग्रणी है। वर्तमान में बहुत सारी सोवा-रिग्-पा वैद्यकीय संस्थाएँ आधुनिक तिब्बत तथा भारत में कार्यरत हैं । मानव-जाति के हितार्थ इस अद्वितीय चिकित्सा व्यवस्था को जीवंत रखने के लिए ये संस्थाएँ अपनी ऊर्जा लगा रही है ।

अनुसंधान प्रकल्प

  1. भोट वनस्पति मिश्रणों का उदर-विकृति, यकृत-विकृति तथा यकृत की बिमारियों पर असर । मधुमेह पर अनुसंधान ।
  2. स्त्री आरोग्य, डॉ. हेस्ली आर. जैफे, यूएसए तथा डॉ. छ़ेरिङ् योदोन, बीटीएम्एस् के साथ संयुक्त रूप से ।
  3. ग्युद्-शी पर तुलनात्मक अध्ययन ।
  4. औषधि मानकीकरण (तिब्बती औषधि) ।
  5. ई डी एम् जी प्रकल्प : तवाङ्, अरुणाचल प्रदेश आदि हिमालयीय प्रदेशों में समुद्र-तल से 16000 फुट ऊँचाई पर 5.47 एकड़ भूमि पर पाई जानेवाली औषधि जड़ी-बूटियों का संरक्षण करने का प्रकल्प ।

शैक्षणिक सम्बन्ध

इस विभाग के अध्यापकवृंद एमरी विश्वविद्यालय यूएसए, तस्मानिया विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया, स्मिथ कॉलेज, यूएसए, वँकाँग डिजिटल विश्वविद्यालय, दक्षिण कोरिया आदि के साथ विनिमय कार्यक्रमों तथा व्याख्यान-मालिकाओं में विनियुक्त है ।

आधार-रचना

  1. चिकित्सालय – यह समाज के बेहतर स्वास्थ्य के लिए अपना योगदान करता है तथा छात्रों को व्यावहारिक शिक्षा प्रदान करता है ।
  2. औषधि -निर्माण कक्ष तथा रोग-निदान कक्ष – इस कक्ष के निर्माण का उद्देश्य है छात्रों को आधुनिक वैद्यकीय तकनीक से परिचित कराना ।
  3. औषधि वनस्पति वाटिका – कालचक्र औषधि वाटिका नामक वनस्पति उद्यान का औषधि जड़ी-बूटियों को विकसित करने के उद्देश्य से तथा परिसर में अधिक वनस्पतियों को रोपण करने की संभावना का अध्ययन करने के लिए स्थापित किया गया है । सौ से भी अधिक वनस्पतियों के प्रकारों का रोपण इस वाटिका में किया गया है । एक उद्देश्य यह भी है कि छात्रों को वनस्पतियों को पहचानने में, उनकी विशेषताओं तथा उन्हें भारत के किन स्थानों पर पाया जा सकता है इस बारे में प्रशिक्षण दिया जा सकें ।

प्राध्यापक वृंद

भोट ज्योतिष विद्या विभाग

केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय में भोट ज्योतिष विद्या विभाग की स्थापना 1993 में की गयी । इसका उद्देश्य है ज्योतिष विद्या की तिब्बती परंपरा को बनाए रखना तथा उसकी अभिवृद्धि करना, ताकि यह विद्या अधिक समृद्ध बन सकें ।

तिब्बती ज्योतिष शास्त्र को तीन विभागों में बाँटा जा सकता है : खगोलशास्त्र, भूत ज्योतिष, दिव्य-दर्शन तथा भविष्य-कथन । खगोल-शास्त्र तथा ज्योतिष शास्त्र दोनों भारतीय, फ़ारसी, यूनानी तथा बौद्ध परंपराओं के संमिश्रण हैं। तिब्बती ज्योतिष विद्या खगोलीय घटनाओं की गणना तथा विशदीकरण की प्राचीन कला है। तिब्बती खगोल-विद्या व्यवस्था सृष्टि-विज्ञान का अध्ययन है । यह व्यवस्था कालचक्र-तंत्र पर आधारित है । इसलिए कालचक्र-तंत्र की साधना के लिए खगोल-विद्या पर प्रभुत्व होना योगियों को अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है । भविष्य-कथन कुछ अलग प्रकार का है, यह महीने के हर दिन के लिए एक अलग स्वर-वर्ण निर्धारित करता है । इस आधार पर वह जन्म, मृत्यु, विवाह, दीर्घ व्याधि आदि पर होनेवाले प्रभाव का आकलन करता है ।

जन्म, मृत्यु, विवाह तथा यात्रा पर जाने के शुभ समय को तय करना आदि अवसरों से जुड़े हुए स्त्री-पुरुषों के दैनंदिन जीवन में तिब्बती ज्योतिष महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।

इतिहास

बौद्ध धर्म का तिब्बत में प्रवेश होने से पहले, तिब्बती ज्योतिष विद्या का आधार बोन धर्म था । बोन पाँच महाभूतों को मानता है और ज्योतिष-कथन (भविष्य-कथन) की एक पद्धति का प्रयोग करता है ।

तिब्बती राजा नम्री सोङछ़ेने, महान् सोङछ़ेन ग्यांपो के पिता, ने चार बुद्धिमान् युवा विद्वानों को ज्योतिष विद्या सीखने के लिए चीन भेजा । उन्होंने तिब्बती ज्योतिष में नये घटकों को प्रविष्ट किया । तथापि, उस समय लेखन कला प्रचलित नहीं थी, इसलिए सारी जानकारी मौखिक परंपरा से सुरक्षित रखी गयी ।

7वीं शताब्दी में राजा सोंङछ़ेन ग्यांपो ने चीनी राजकुमारी कोङ् जू से विवाह किया । कोङ् जू ने तिब्बत में अभिजात चीनी महाभौतिक ज्योतिष को प्रविष्ट किया ।

सम्राट ट्रिसोङ् देछ़ेन के शासन-काल में तिब्बती वैद्यक, ज्योतिष तथा बौद्ध धर्म चोटी पर पहुँच गये थे । इस कालावधि को तिब्बती इतिहास का सुनहरा काल कहा जा सकता है । इस कालखंड में भारतीय तथा तिब्बती विद्वानों ने अपने सामने रखे हुए उच्च मानक शतकों तक बरक़रार रहे ।

11वीं शती में श्रीकालचक तंत्र का संस्कृत से तिब्बती में अनुवाद हुआ । यह बौद्ध तंत्र ग्रंथ आधुनिक तिब्बती ज्योतिष का आधार बना और इसके परिणाम स्वरूप तिब्बती पंचांग बना ।

17वीं शती में परम पावन पंचम दलाईलामा, ङवङ् लोब्सङ् ग्याछो के नेतृत्व में तिब्बती ज्योतिष विद्या अपने पूर्व गौरव को प्राप्त हुई । उनके राज-प्रतिनिधि, देसी संग्ये ग्याछ़ो ने तिब्बती ज्योतिष विद्या का संकलन किया, यह पुस्तक तिब्बती ज्योतिष-विदों के लिए एक उपयोगी निर्देशन पुस्तिका रही है ।

अनुसंधान प्रकल्प

  1. तिब्बती तथा भारतीय पंचांगों की घनिष्टता के आधार पर एक आधुनिक पंचांग कि निर्मित करने पर अनुसंधान ।
  2. कग्युर, तंग्युर तथा सुङ्बुम् से तिब्बती ज्योतिर्विद्या से संबंधित पाठों लका संकलन कर अध्येताओं तथा विद्वानों को उपलब्ध कराना ।

शैक्षणिक सम्बन्ध

इस विद्या-विभाग के अध्यापक स्मिथ कॉलेज, यू एस ए तथा तस्मानिया युनिवर्सिटी, ऑस्ट्रेलिया से आनेवाले आदान-प्रदान कार्यक्रम के विद्यार्थियों को अध्यापन में शामिल कर लेते है ।

प्राध्यापक-वृंद