कुलपति

प्रो. गेशे ङवङ् समतेन

कुलपति

कें.ति. अ. विश्वविद्यालय
(भूतपूर्व केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान)
सारनाथ, वाराणसी-221007
उत्तर प्रदेश, भारत
दूरभाष : +542-2585242,
Fax : +542-2585150
ई-मेल :vcoffice.cuts@gmail.com

जन्म-तिथि : 7 जुलाई, 1956
पिता का नाम : फुंट्सोक् टशी
माता का नाम : छ़ेरिङ् छ़ोमो

पूज्य प्रो. गेशे ङवङ् समतेन ने जनवरी, 2001 में केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के निदेशक का कार्यभार सँभाला । संगठन के सिफारिश के अनुसार इस संस्थान का नाम बदलकर केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय रखा गया (1956 के यू जी सी कानून के अनुभाग 3 के तहत मान्य विश्वविद्यालय) और वैसी भारत सरकार से मंजूरी मिल गयी । इस नये नामांतरित संस्थान का अनावरण परम पावन दलाई लामा द्वारा 15 जनवरी, 2009 को हुआ और ऐसी घोषणा 15 जनवरी, 2009 को की गयी । इसके अनुसार इस संस्थान के प्रमुख का पद-नाम भी संशोधित होकर कुलपति हो गया ।

17 जुलाई, 2008 से भारत सरकार ने पूज्य प्रो. गेशे ङवङ् समतेन की नियुक्ति कुलपति के पद पर की ।

प्रो. गेशे ङवङ् समतेन बौद्ध तथा तिब्बती विद्या के जाने-माने विद्वान है । भारत में तथा भारत के बाहर के शैक्षिक क्षेत्र में उनके अपने अध्ययन क्षेत्र में किये योगदान को मान्यता प्राप्त है । उन्हें शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में पद्मश्री उपाधि प्रदान कर 2008 में भारत सरकार ने अलंकृत किया है ।

कुलपति का सचिवालय

  • श्री नंदकिशोर सिंह
    सहायक कुलसचिव
  • श्री सुनिल कुमार
    व्यक्तिगत सचिव
  • श्री तेन्ज़िन सिडोन
    तकनीकी सहायक
  • श्री तेन्ज़िन कुनसेल
    अनुसंधान/व्यक्तिगत सहायक

कुलपति का कार्यालय

कमलशील भवन

कें. ति. अ. वि., सारनाथ,
वाराणसी-221007
उत्तर प्रदेश, भारत
दूरभाष : 0542-2585242, 2586337,
फैक्स : 0542-2585150
ई-मेल : vcoffice.cuts@gmail.com

कुलपति का व्यक्ति-परिचय

प्रो. गेशे ङवङ् समतेन
कुलपति, कें. ति. अ. वि.
(पूर्व केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान) सारनाथ, वाराणसी ।

7 जुलाई, 1956 को मध्य तिब्बत के दोखर में जन्मे । प्रो. समतेन अपने माता-पिता के साथ, 1959 में चीन द्वारा तिब्बत पर क़ब्जा करने के बाद, भारत में आये । उन्होंने उड़ीसा के चंद्रगिरि में स्थित तिब्बतियों की केंद्रीय शाला में अध्ययन किया, तथा उसके बाद कें. ति. उच्च शिक्षा संस्थान में उच्च अध्ययन किया । यहाँ पर उन्होंने शास्त्री तथा आचार्य की उपाधियाँ प्राप्त कीं । आधुनिक पद्धति का शिक्षण तथा तिब्बती पारम्परिक शिक्षण इन दोनों का दुर्लभ योग उनमें हुआ है । उनकी भिक्षु-शिक्षा कर्नाटक के मुंडगोड में स्थित गादेन शार्त्से मठ में हुई । उन्होंने गेशे रम्पा और फिर गेशे ल्हारम्पा (पीएच्. डी. के समकक्ष) उपाधियाँ प्राप्त कीं । अपनी शैक्षिक जीवन-यात्रा उन्होंने सारनाथ संस्थान में अनुसंधान सहायक के रूप में शुरू की । आगे चलकर प्राचीन काल में भारतीय तथा तिब्बती पंडितों ने मिल-जुलकर किये तिब्बती अनुवादों के आधार पर संस्कृत में लुप्त बौद्ध ग्रंथों का तिब्बती अनुवादों से पुर्नरुद्धार करने के लिए स्थापित अनुसंधान विभाग के वे प्रमुख बनाये गये । इस अद्वितीय अनुसंधान कार्य से उनकी अभिजात तिब्बती तथा संस्कृत भाषाओं की विद्वत्ता का तथा उनके दुर्लभ अनुवाद-कौशल्य का पता चलता है । इस क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों के फल-स्वरूप, उनकी बौद्ध दर्शन के प्राध्यापक पद पर पदोन्नति की गई । संस्कृत तथा तिब्बती बौद्ध ग्रंथों के हिंदी अनुवाद कार्य में भी वे सक्रिय है ।

नागार्जुन के दर्शन में अपनी विशेष रुचि के कारण, प्रो. समतेन ने ‘रत्नावली’ की भाष्य सहित निर्णायक आलोचनात्मक आवृत्ति प्रकाशित की है – यह उनके स्नातकोत्तर अनुसंधान का फलित था । कई महत्त्वपूर्ण प्रकाशनों का श्रेय उन्हें जाता है – जैसे कि ‘अभिधम्मत्थसंगहो’ की समालोचनात्मक आवृत्ति, ’पिंड़िक्रमा’ तथा नागार्जुन कृत ‘पंचक्रम’ के संस्कृत तथा तिब्बती पाठों की समालोचनात्मक आवृत्ति और अभी-अभी, नागार्जुन की मूलमध्यमक कारिका पर तिब्बती आचार्य दार्शनिक चोंखा-पा के भाष्य का टिप्पणियों सहित अंग्रेजी अनुवाद ‘द ओशन ऑफ रीज़निंग्’ ऑक्स्फोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित । इस ग्रंथ को दूर-दराज में सराहा गया है ।

भारत में बौद्ध अध्ययन को उत्तेजन देने के कार्य में वे सफलीभूत हुए है । कई सारे विश्वविद्यालयों को बौद्ध विद्या के पाठयक्रम तैयार करने के काम में उनकी विद्वत्ता तथा अंतर्दृष्टि का लाभ पहुँचा है । विविध क्षेत्रों के कौशल्य के विकास के साथ-साथ, छात्रों में मूल्यों के विकास के माध्यम से परिवर्तन लाने में शिक्षा व्यवस्था का योगदान होना जरूरी है, इस दृष्टिकोण के वे समर्थक है । यू एस ए, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, रुश तथा भारत में शैक्षिक समुदायों को संबोधित करते हुए वे प्रायः देश-विदेश में यात्रा करते रहते है । विविध राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा सत्रों में, कार्यशालाओं में तथा सम्मेलनों में वे कार्यरत रहते आये है । हैंप्शायर, ऐमहर्स्ट तथा यूएसए के स्मिथ कॉलेज और ऑस्ट्रेलिया के तस्मानिया विश्वविद्यालय में उन्होंने आमंत्रित प्राध्यापक के अधिन्यास पर कार्य किया है । उनकी विदग्धता तथा प्रज्ञा के कारण प्रो. समतेन की नियुक्ति भारत के मंत्रालयों में विशेषज्ञ-समितियों पर तथा असंख्य संकायों पर हुई हैं और वे कनाडा, थाईलैण्ड, फ्रान्स, ऑस्ट्रिया के कई संस्थानों की समितियों के सदस्य रहे है । हार्वर्ड की अन्तर्राष्ट्रीय तिब्बती विद्या संघ के संपादक-मंडल पर भी उन्होंने काम किया है । वे विविध समितियों के सदस्य हैं – जैसे कि भारतीय विश्वविद्यालय संघ की संचालक समिति, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की विविध विशेषज्ञ समितियों के अध्यक्ष / सदस्य । 2008 में उन्हें शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए भारत सरकार के राष्ट्रपति द्वारा ‘पद्मश्री’ उपाधि प्रदान की गयी । वर्तमान समय में वे कें. ति. अ. वि., सारनाथ, वाराणसी के कुलपति है ।

कुलपति - संक्षिप्त व्यक्ति परिचय

प्रो. गेशे ङवङ् समतेन (जन्म1956) वर्तमान स्थिति में कें. ति. अ. वि. सारनाथ, वाराणसी के कुलपति हैं तथा इस पद को ग्रहण करने के पहले वे भारतीय बौद्ध दर्शन के प्राध्यापक रहे है । उनकी शिक्षा आधुनिक ढ़ंग से तथा बौद्ध और तिब्बती भिक्षु-परम्परा दोनों प्रकार से हुई । उनका श्रेय-नामावाली में ‘रत्नावली’ का समालोचनात्मक संपादन (‘अभिधम्मत्थसंगहो’ भाष्य के साथ), नागार्जुन के ‘पिंडीकृत’ तथा ‘पंचक्रम’, ‘मंजुश्री’ (तिब्बती-बौद्ध पट्ट-चित्रांकन) पर सोदाहरण प्रबन्ध तथा ‘द ओशन ऑफ रीज़निंग’ का सह-लेखकत्व (यह तिब्बती आचार्य-दार्शनिक च़ोंखा-पा की नागार्जुन कृत ‘मूलमध्यमककारिका’ के तिब्बती भाष्य का टिप्पणियों सहित अँग्रेजी अनुवाद है ।) और भारत तथा भारत के बाहर पांड़ित्यपूर्ण संकलनों में उनके बीसों निबंध प्रकाशित हुए है । यूएसए तथा ऑस्ट्रेलिया के विविध विश्वविद्यालयों में वे आमंत्रित प्राध्यापक रहे है । भारत में बौद्ध विद्याओं का प्रसार करने में भी उनका काफी योगदान रहा है । बौद्ध दर्शन तथा अनुसंधान के पाठ्य-क्रमों का निर्धारण करने के मामले में भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों ने उनका मार्गदर्शन तथा परामर्श लिया है । वे अनगिनत शैक्षिक समितियों, विश्वविद्यालयों तथा भारत सरकार के मंत्रालयों की विशेषज्ञ समितियों के सदस्य है । 2008 में, उनके शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में किए विशिष्ट योगदान की मान्यता के तौर पर भारत के राष्ट्रपति द्वारा उन्हें ‘पद्मक्षी’ उपाधि से अलंकृत किया गया ।

शिक्षण

  1. तिब्बतियों के लिए केंद्रीय विद्यालय, चन्द्र गिरि , उड़ीसा, 1963-1970
  2. केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान, सारनाथ, वाराणसी
  3. पूर्वमध्यमा (हाईस्कूल), प्रथम श्रेणी, 1971-73
  4. उत्तरमध्यमा (इंटरमीडियट), प्रथम श्रेणी 1973-75
  5. शास्त्री (स्नातक) प्रथम श्रेणी, 1975-1977
  6. आचार्य (स्नातकोत्तर), विशेष योग्यता 1977-1980
  7. मास्टर ऑफ फिलॉसफी, 1980-1982
  8. पीएच् डी समकक्ष अनुसंधान - नागार्जुन की ‘रत्नावली’ पर, 1982-1988

भिक्षु-शिक्षा

  1. गादेन शार्त्से मठ, मुंडगोड, कर्नाटक, दक्षिण भारत, रब्जंबा उपाधि (बी.ए. समकक्ष) 1994
  2. गेशे धोरम्पा उपाधि (एम. ए. समकक्ष) 1995
  3. गेशे ल्हारम्पा उपाधि (पीएच् डी के समकक्ष तिब्बती पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत सर्वोच्च उपाधि)
    1997

नियुक्ति/कार्य - भारत में

  1. अनुसंधान सहायक, कें. उ. ति. शिक्षा संस्थान, सारनाथ, 1982-1986
  2. संपादक, 1986-1999

  3. तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ में आमंत्रित प्राध्यापक, 1998

  4. प्राध्यापक, 1999

  5. अतिरिक्त निदेशक, 1999-2001

  6. निदेशक/कुलपति, 2001

आमंत्रित प्राध्यापक

  1. हैम्पशायर कॉलेज, मसेशुसेट्स्, यूएसए में आमंत्रित प्राध्यापक, बसंत सत्रार्ध, 1996

  2. तस्मानिया विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया में आमंत्रित प्राध्यापक, शिशिर सत्रार्ध, 1999

  3. ऐमहर्स्ट् कॉलेज, एम् ए, यूएसए, में आमंत्रित प्राध्यापक, एक वर्ष के लिए, 2000

  4. स्मिथ कॉलेज, एम् ए, यूएसए, में आमंत्रित प्राध्यापक, 2000

प्रकाशन-पुस्तकें

  1. दुर्लभ थन्-का (तिब्बती पट्ट-चित्रांकनों) की तालिका (जो नई दिल्ली में कें. उ. ति. श. संस्थान, सारनाथ तथा तिब्बत हाउस, नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में 1986 में आयोजित प्रदर्शन के लिए प्रकाशित हुई थी ।

  2. ‘अभिधम्मत्थसंगहो’ का सहभाग-संपादन, – कें. उ. ति. शि. संस्थान द्वारा प्रकाशित, 1989

  3. ‘रत्नावली’ का तिब्बती संस्करण तथा उस पर लिखा गया तिब्बती में अनुवादित एकमेव भारतीय भाष्य का समालोचनात्मक संपादन, विस्तृत प्रस्तावना तथा परिशिष्टों सहित – कें. उ. ति. शि. संस्थान द्वारा खंड 1 के रूप में प्रकाशित, 1990

  4. नागार्जुन कृत ‘पिड़िक्रम’ तथा ‘पंचक्रम’ के संस्कृत तथा तिब्बती पाठों की सहभाग-संपादित समलोचनात्मक आवृत्ति, कें. उ. ति. शि. संस्थान, सारनाथ, द्वारा प्रकाशित, 2001

  5. ‘ओशन ऑफ रीज़निंग’ : नागार्जुन के मूलमध्यमककारिका पर लिखे सबसे अधिक विस्तृत भाष्य का अनुवाद, ऑक्स्फोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क द्वारा प्रकाशित, 2006

वार्ताएँ

  1. यूएसए, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, रुश, थाइलैण्ड तथा भारत के विविध विश्वविद्यालयों में भाषण दिये ।

लेख

  1. विविध नियतकालिकों, अभिनन्दन पत्रिकाओं, स्मरणिकाओं तथा विशेष मासिकाओं आदि में अनेकानेक लेखों का योगदान ।

सम्मेलन/चर्चा-सत्र

  1. भारत में तथा विदेशों में राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कई सम्मेलनों में, चर्चा-सत्रों में, कार्यशालाओं में सहभाग ।

पुरस्कार

  1. शिक्षा तथा साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा 26-01-2009 को उन्हें ‘पद्मश्री’ पुरस्कार की घोषणा की गयी, तथा 31-03-2009 को पद्मश्री पुरस्कार प्रदान समारोह में यह पुरस्कार दिया गया ।

अन्य संस्थानों/संगठनों के साथ साहचर्य

भारत में

  • सदस्य : कार्यकारिणी समिति, श्री लालबहादुर शास्त्री संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली ।

  • सदस्य : विद्वत् समिति, ज्ञान-प्रवाह, वाराणसी, 2007

  • सदस्य : बौद्ध/तिब्बती संगठनों को आर्थिक सहायता के लिए स्थापित विशेषज्ञ समिति, संस्कति मंत्रालय, भारत सरकार, 2001

     

  • सदस्य : अनुसंधान अनुदान समिति, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली ।

     

  • सदस्य : टीवीसी कॉलेज, संचालक मंडल, बेंगलूरु, 2006

     

  • अध्यक्ष: भारत सरकार के स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण मंत्रालय के ‘आयुष’ विभाग द्वारा स्थापित सोवा रिग् पा तिब्बती वैद्यक व्यवस्था का स्थान, बल तथा साहचर्य की परीक्षा करने के लिए नियुक्त विशेषज्ञ समिति ।

     

  • सदस्य : बौद्ध अध्यापन-अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए स्थापित समिति (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, 2008)

     

  • सदस्य : संचालक मंडल, अखिल भारतीय विश्वविद्यालय संघ, नई दिल्ली, 2008

     

  • सदस्य : कर्मचारी कार्य-व्यापार समिति, भारतीय विश्वविद्यालय संघ, नई दिल्ली, 2008

     

  • सदस्य : समतुल्यता समिति, भारतीय विश्वविद्यालय संघ, नई दिल्ली, 2008

     

  • सदस्य : सर्वसाधारण मंत्रणा-सभा, नमग्याल इन्स्टिट्यूट ऑफ तिबेटॉलॉजी, सिक्कीम, 2008

     

  • सदस्य : शैक्षिक मंत्रणा-सभा, संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, 2009

     

  • सदस्य : बनारस हिंदू युनिवर्सिटी दरबार, वाराणसी, 2009

     

  • सदस्य : सांस्कृतिक समिति, भारतीय विश्वविद्यालय संघ, नई दिल्ली, 2010

     

  • अध्यक्ष : 5वीं योजना के काल-खंड में ‘एपोक्-मेकिंग थिंकर्स ऑफ इंडिया’ के तहत बौद्ध अध्ययन के लिए स्थापित केंद्रों का जायजा लेने के लिए बनाई गई विशेषज्ञ समिति (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली, द्वारा 2010 में स्थापित)

     

  • सदस्य : मानव संसाधन विकास मंत्रालय (भारत सरकार) द्वारा 2010 में बनाई गई स्थानिक पारम्परिक ज्ञान तथा संकट-ग्रस्त भाषाओं के संरक्षण के लिए स्थापित गोल-मेज परिषद्,

     

  • सदस्य : माननीय प्रधान-मंत्री की अध्यक्षता में स्वामी विवेकानन्द की 150 वीं जयन्ती मनाने के लिए (भारत सरकार द्वारा 2010 में) गठित राष्ट्रीय समिति, आश्रयदाता : अनुसंधान सलाहकार मंडल (एकेडेमिक काउन्सिल), पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी, 2010,

विदेश में

  • सदस्य : सलाहकार मंडल, स्कूल ऑफ फिलॉसफी तथा तस्मानिया विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया

     

  • सदस्य : संपादक मंडल, अंतर-राष्ट्रीय तिब्बती अध्ययन संघ, हार्वर्ड तथा यूएसए,

     

  • सदस्य : सलाहकार समिति, तिब्बती प्रतिष्टित साहित्य/ ग्रंथ/ संस्थान- कनाडा, संस्थापक सदस्य : कार्यकारिणी सभा, अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध विश्वविद्यालय संघ, थाईलैण्ड, 2007,

     

  • सदस्य : सलाहकार समिति, तेन्ज़िन ग्याछो अध्येता कार्यक्रम, तेन्ज़िन ग्याछो संस्थान, लेरब लिंग, फ्रान्स, 2008,

     

  • सदस्य : संचालक मंडल, अन्तर्राष्ट्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान (तिबेट सेंटर-I.I.H.T.S.) ऑस्ट्रिया, 2008,